पिछले कुछ महीने दुखद रूप से गुजर चुके करीबी दोस्तों और प्रियजनों के शोक संदेश से भरे रहे. एक दूसरे तरह का दुख उन राजनैतिक सहयोगियों के लिए फेयरवेल नोट्स को लिखने का है जो इस कठिन वक्त में पार्टी को छोड़कर चले गए. मेरे दिवंगत दोस्त जितेंद्र प्रसाद (हमारे लिए जिती भाई और लोगों के लिए सम्मानपूर्वक बावा साहेब) के बेटे जितिन प्रसाद का जाना बड़ी चिंता की और दुखद बात है.

यकीनन हम इस बात को भी पूरी तरह नहीं भूल सकते कि हममें से कइयों ने दिवंगत जितेंद्र प्रसाद के द्वारा पार्टी चुनाव में कांग्रेस अध्यक्षा को चुनौती देने को धोखेबाजी का नाम दिया था. यह तर्क दिया जा सकता है कि यह उनका लोकतांत्रिक अधिकार था और यह बात निश्चित रूप से तकनीकी तौर पर सही भी है. लेकिन रिश्ते अधिकारों के सिर्फ सही और गलत होने के नियमों से कहीं अधिक हैं. मजेदार बात है कि इसके लिए शायद ही कोई स्पष्टीकरण है जो नैतिक तौर पर प्रशंसनीय हो. ना तब था और ना आज है.

शशि थरूर ने अपने अनोखे अंदाज में विचारधारा को आगे बढ़ाने के लिए राजनीति में आने वाले लोगों और इसे कैरियर के रूप में देखने वाले लोगों के बीच अंतर बताया है. इसी सवाल पर युवा नेताओं का दलबदल चिंता का कारण दिखता है .क्या अलोकतांत्रिक तत्व सत्ता के खेल में शामिल हो गए हैं जहां पैसे का ना होना ही सत्ता के ना होने का कारण बनता है?

और भी लोग पार्टी छोड़ सकते हैं इसलिए दलबदल के मसले पर चिंता जरूरी है. सत्ता में वापस आना हमारा उद्देश्य होना चाहिए और महत्वाकांक्षा भी. अगर अपने लिए नहीं तो निश्चित रूप से देश के लिए. हम न तो खुद को एक NGO में बदल सकते हैं और ना ही राजनीति में आवश्यक रूप से जुड़े व्यवहारिक तत्वों को नकार सकते हैं. लेकिन अंत में विचारधारा पर ही वापस लौटना होगा और अपनी एनर्जी को उससे रिचार्ज करना होगा.

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