प्रधानमंत्री मोदी के साथ मीटिंग में उपस्थित नहीं रहने के कारण पश्चिम बंगाल के पूर्व चीफ सेक्रेटरी अलापन बंद्योपाध्याय को केंद्र सरकार द्वारा नोटिस जारी किए जाने और दिल्ली तलब किए जाने के फैसले को पूर्व कैबिनेट सचिव और पूर्व सचिव समेत कई बड़े नौकरशाहों ने गलत ठहराया है। पूर्व आईएएस अधिकारियों ने मोदी सरकार के फैसले को अभूतपूर्व, परेशान करने वाला और नियमों की अवहेलना करने वाला बताया है।

अलापन बंद्योपाध्याय मामले को लेकर द इंडियन एक्सप्रेस ने पूर्व गृह सचिव जी के पिल्लई, पूर्व कैबिनेट सचिव बी के चतुर्वेदी और डीओपीटी (सिविल सेवा के अधिकारियों के काम का बंटवारा करने वाला मंत्रालय) के पूर्व सचिव सत्यानंद मिश्रा से बात की। तीनों वरिष्ठ नौकरशाहों ने केंद्र सरकार के फैसले को लेकर कहा कि यह अधिकारियों के लिए अच्छी मिसाल नहीं है और इससे सिविल सेवा के अधिकारियों को निराशा होगी।

पूर्व गृह सचिव जी के पिल्लई ने इस मसले पर कहा कि आजाद भारत के इतिहास में यह पहली बार हुआ जब एक सचिव स्तर के अधिकारी को सेवानिवृत्ति से एक दिन पहले केंद्र में तैनात करने का आदेश दिया गया। साथ ही उन्होंने 10 बजे से पहले दिल्ली रिपोर्ट करने के फैसले पर भी अचरज जताते हुए कहा कि ऐसा पहले कभी भी नहीं हुआ था। आमतौर पर सिविल सेवा के अधिकारियों को किसी दूसरे जगह पर कार्यभार ग्रहण करने के लिए कम से कम छह दिन का समय दिया जाता है।

इसके अलावा जी के पिल्लई ने डीओपीटी के द्वारा दिल्ली तबादले के फैसले पर भी आश्चर्य व्यक्त किया। पिल्लई ने कहा कि डीओपीटी सचिव इस तरह के आदेश को जारी करने के लिए सहमत हैं, इससे पता चलता है कि भारतीय नौकरशाही में बहुत कुछ है। साथ ही पिल्लई ने कहा कि मैंने अपने करियर में ऐसा कभी नहीं देखा कि मीटिंग में गैरहाजिर रहने की वजह से नोटिस जारी किया गया हो।

वहीं पूर्व कैबिनेट सचिव बी के चतुर्वेदी ने कहा कि लगता है कि प्रधानमंत्री मोदी के सलाहकारों ने उन्हें गलत सलाह दे दी। चतुर्वेदी ने कहा कि अगर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के आवेदन पर भारत सरकार ने अलापन बंद्योपाध्याय के सेवा को तीन महीनों के लिए बढ़ा दिया था तो उसका यह मतलब है कि पश्चिम बंगाल में उनका बने रहना महत्वपूर्ण था। लेकिन अलापन के आचरण से दुखी होकर इस तरह के नोटिस को जारी करना सही नहीं है. इससे सिविल सेवा के अधिकारियों में विश्वासहीनता पैदा होती है।

कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग (डीओपीटी) के पूर्व सचिव सत्यानंद मिश्रा ने भी केंद्र सरकार के तरीकों पर सवाल उठाए। सत्यानंद मिश्रा ने कहा कि सिविल सेवा की कल्पना मुख्य रूप से राज्यों में सेवा करने के लिए की गई थी। जो केंद्र में आने के इच्छुक होते हैं वे ही केंद्र में आकर काम करते हैं। लेकिन अगर किसी अधिकारी से नाराज होकर उसे केंद्र में बुलाया जाता है तो इस स्थिति में अधिकारी ऐसे काम कर पाएंगे। 

आगे उन्होंने कहा कि अलापन बंद्योपाध्याय को बिना किसी के पोस्टिंग के केंद्र में बुला लिया गया, आखिर सरकार चाहती क्या थी। उन्हें तीन महीने का सेवा विस्तार दिया गया था, इस नाते उन्हें राज्य में ही रहना था लेकिन इसके बावजूद उन्हें केंद्र में बुलाने का आदेश दे दिया गया। इसके अलावा उन्होंने कहा कि सिर्फ मीटिंग में ना के कारण डिजास्टर मैनेजमेंट एक्ट के तहत नोटिस जारी कर दिया गया। यह बहुत ही बेवकूफाना कदम था। अगर डिजास्टर मैनेजमेंट एक्ट के तहत मीटिंग बुलाई जाती है तभी इस एक्ट के तहत बैठक में गैरहाजिर रहने पर नोटिस जारी किया जा सकता है।

बता दें कि बीते शुक्रवार को प्रधानमंत्री मोदी ने साइक्लोन तूफान की समीक्षा को लेकर पश्चिम बंगाल के कलाईकुंडा में मीटिंग बुलाई थी। इस मीटिंग में पूर्व मुख्य सचिव अलापन बंद्योपाध्याय मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के साथ 15 मिनट की देरी से पहुंचे थे और तुरंत ही बैठक छोड़ चले गए थे। दरअसल ममता बनर्जी प्रधानमंत्री मोदी के साथ होने वाली मीटिंग में केंद्रीय मंत्रियों और विपक्षी दल के नेता के मौजूद होने की वजह से बैठक छोड़ कर चली गईं थी। अलापन भी मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के साथ ही चले गए थे। बाद में अलापन को मीटिंग में शामिल नहीं होने के कारण केंद्र सरकार की तरफ से नोटिस जारी किया गया था और दिल्ली तलब करने का आदेश दिया गया था। लेकिन अलापन सोमवार को ही मुख्य सचिव के पद से रिटायर हो गए और ममता बनर्जी ने उन्हें अपना मुख्य सलाहकार नियुक्त कर लिया। 

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