भरतपुर । कोराेना ने एक बार फिर परंपराओं को बदल दिया है। मृत्युभोज तो पहली लहर में ही बंद हो गए थे। अब लोग तीये की बैठकें भी स्थगित कर रहे हैं। गरुण पुराण और अस्थि विसर्जन जैसे कार्यक्रम भी टल रहे हैं। इन दिनों ब्राह्मण भी यजमान को तिलक लगाने और कलावा बांधने से बच रहे हैं। दक्षिणा स्वरूप अब ब्राहणों को मास्क और सेनेटाइजर दिए जा रहे हैं। इस संंबंध में परिवाराें से संपर्क करके जानने की कोशिश की कि कोरोना की दूसरी लहर में मृत्युभोज के बाद कौन-कौन सी रवायतें बदली हैं।

अग्रवाल महासभा के जिलाध्यक्ष अनुराग गर्ग ने बताया कि हाल ही उनके एक रिश्तेदार के यहां ब्रह्मभाेज थे। तब सिर्फ एक पंडित काे ही भोजन कराया गया। जबकि अन्य 30 ब्राह्मणों काे टिफिन में घर पर ही भोजन और दक्षिणा पहुंचाई गई। डीग में लाेहा बाजार निवासी गाैरी शंकर ने बताया कि कुछ दिन पहले् ही उनकी मां के ब्रह्मभाेज थे। निमंत्रण स्वीकार करने के बाद भी आधे से भी कम ब्राह्मण भोजन करने आए।

फिर प्रधान पंडित की सलाह पर शेष संख्या के बराबर कन्याओं काे भाेजन कराया गया। नहीं आने वाले ब्राह्मणाें काे घर पर ही भाेजन भिजवाया गया।ज्योतिषाचार्य जितेंद्र पाेपा गुरु बताते हैं कि यह कोरोनाकाल पुरातन परंपराओं और रीति-रिवाजों को निभाने का नहीं है। शास्त्रों में भी लिखा है- आपत्ति काले मर्यादा नास्ति..इसलिए कोरोना संक्रमण के भय से परंपरा और व्यवस्थाओं में बदलाव आया है। ब्राह्मण के बजाय हवन भोज्य सामग्री डालने अथवा गायों को भोजन खिलाया जाना शास्त्रसम्मत है। क्योकि गाय में सभी देवताओं का वास माना गया है। नई परंपराओं समाज भी स्वीकार कर रहा है। ये परंपराएं अच्छी हैं, आगे भी चलनी चाहिए।

परिजन की मृत्यु के बाद होती थी ये परंपराएं… जो बदल गई
तीये बैठक/उठावना ः शोक जताने के लिए पहले तीये की बैठक या उठावने में 200 से 300 लोग जुटना आम बात थी। अब शोकाकुल परिवार शोक समाचार में ही बैठक स्थगित करने की सूचना देकर अपने निवास से ही दिवंगत आत्मा की शांति के लिए ईश्वर से प्रार्थना करने को बोल रहे हैं। विज्ञापन इसलिए दे रहे हैं ताकि परिचितों को सूचना मिल सके।
गरुण पुराण: आत्मा की शांति के लिए गरुण पुराण वाचन का प्रावधान है। कोरोनाकाल में यह परंपरा बदली है। अब गरुण पुराण बिठा ही नहीं रहे हैं अथवा 7वें दिन (आखिरी दिन) गरुण पुराण की औपचारिकता निभा रहे हैं। इसमें भी प्रोटोकॉल का ध्यान रख रहे हैं।
अस्थि विसर्जन: मान्यता है कि अस्थि विसर्जन, तर्पण और श्राद्ध के बिना दिवंगत आत्मा को शांति नहीं मिलती। चूंकि इन दिनों संपूर्ण लॉकडाउन लगा हुआ है। गंगाजी में हाल ही बड़ी संख्या में शव मिलने का मामला सामने आने के बाद भरतपुर के लोग मथुरा स्थित यमुना नदी में और बाकी जगह अन्य पवित्र जल स्रोतों में अस्थि विसर्जन शुरू हो गए हैं।

ब्रह्मभोज: इस कोरोनाकाल में ब्रह्मभाेज की व्यवस्था भी बदली है। अब पर्ची सिस्टम शुरू हो गया है। इसके तहत किसी एक ब्राह्मण को ही ब्रह्मभोज के लिए ब्राह्मणों की व्यवस्था करने की जिम्मेदारी दे दी जाती है। ब्राह्मण न्यौता देने के लिए पर्चियां भिजवा देता है। या तो ब्राह्मण पर्ची देकर यजमान के घर से टिफिन मंगवा लेते हैं या फिर यजमान उनके घर टिफिन भिजवा देते हैं। कुछ परिवार ब्राह्मणों के हिस्से का भोजन निकाल कर गायों को खिला रहे हैं अथवा इंदिरा रसोई से कूपन कटवाकर गरीब और जरूरतमंदों को भोजन करवा रहे हैं। पंडित सुभाष व्यास बताते हैं कि कुछ परिवार कन्याओं को भोजन करवाकर ब्रह्मभोज की परंपरा निभा रहे हैं।

पगड़ी व्यवस्था: ब्रह्मभोज के बाद शोकाकुल परिवार में सबसे बड़े पुत्र को बंधने वाली पगड़ी रस्म व्यवस्था में भी बदलाव आया है। लेकिन, अब सूक्ष्म कार्यक्रम के तहत केवल कुटंब की ओर से एक ही पगड़ी बांधी जा रही है।

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