जहां एक और स्थानीय विधायक एवं राज्य सरकार में बेहद मजबूत मंत्री श्री शांति धारीवाल लगातार शहर में कोरोना से लड़ाई के मद्देनजर साधन ,सुविधाएं ऑक्सीजन, दवाइयां जूटाने में कमर कसकर लगे हुए हैं वही उनकी मेहनत पर पानी फेरने में कुछ अधिकारी कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं।

शहर की चिकित्सा व्यवस्था जिन अधिकारियों के हाथों में है वह कितने संवेदनहीन है इसका एक नमूना मैं आपके सामने रख रहा  हूं जो अधिकारी फोन ना उठाएं संदेश करने पर जवाब ना दे मेरा मानना है ऐसे अधिकारियों को अपने पद पर रहने का कोई अधिकार नहीं है सरकार को ऐसे संवेदनहीन अधिकारियों को ऐसे संवेदनशील पदों से हटा कर बर्फ में लगा देना चाहिए ।

आज मेरे पास एक मेरे परिचित का फोन आया की मेरी माता जी जिनकी आयु लगभग 65-70 वर्ष है उनका ऑक्सीजन लेवल 75-80 के आस पास चला गया है और वह खुद जोकि लगभग 40 वर्ष के हैं उनका ऑक्सीजन लेवल भी 85 और 90 के बीच में चल रहा है।

मैंने उन्हें तुरंत मेडिकल कॉलेज में जाकर दिखाने की सलाह दी और कहीं से एक छोटा और सीजन सिलेंडर की व्यवस्था हुई कार में बैठकर वह मेडिकल कॉलेज गए।

मेडिकल कॉलेज में कोविड-19 में उनसे कहा गया कि यहां पर आपको भर्ती नहीं किया जा सकता है आप घर पर ही रह कर ऑक्सीजन की व्यवस्था करें और काम चलाएं।

अब यहां पर प्रश्न दो उठते हैं की रसूखदार लोग तो कहीं ना कहीं से ऑक्सीजन सिलेंडर अथवा ऑक्सीजन कंसंट्रेटर की व्यवस्था कर लेंगे हालांकि अभी तो यह व्यवस्था रसूखदार लोगों की भी नहीं हो पा रही है लेकिन गरीब आदमी कहां जाएगा वह गरीब युवक जो खुद पीड़ित है ओर से अपनी मां को लेकर कैसे ऑक्सीजन लग जाएगा या अपनी आंखों के सामने अपनी मां को तड़पते हुए मरते देखेगा और खुद भी तिल तिल कर मरेगा ।

मेरे उन परिचित ने मुझसे फोन पर कहा कि उन्हें मेडिकल कॉलेज से वापस कर दिया गया है उनके पास पिछले इलाज के मेडिकल कॉलेज के एक सहायक आचार्य का पर्चा भी था फिर भी उन्हें भर्ती करने के बजाए वापस भेजना कहां तक न्यायोचित है? यह मेरी समझ से परे है फिर चाहे हम 250 वार्ड का कोटा विश्वविद्यालय में कोविड सेन्टर बना ले या  2500 बेड़ का ; कोई फर्क नहीं पड़ता अगर एक आम आदमी को बगैर सिफारिश के वहां पर प्रवेश नहीं मिलता ।

जब तक प्रशासन संवेदनशीलता के साथ मरीजों के साथ व्यवहार नहीं करेगा उनकी परेशानी नहीं सुनेगा , तब तक इंतजाम कुछ भी हो उसका लाभ वास्तविक व्यक्ति को नहीं मिल पाएगा।

इस घटनाक्रम के पश्चात मैंने कोटा के मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी श्री तंवर से फोन पर कम से कम 8 बार बात करने का प्रयास किया लेकिन उन्होंने फोन उठाना ही उचित ना समझा।

उनको मैंने संदेश देते हुए कहा कि कृपया वह मेरा फोन उठाएं और मैंने कुछ बुनियादी सवाल भी उनसे पूछे शायद वह उनके कार्यालय के भ्रष्टाचार के आरोप में पकड़े गए संविदा के कर्मचारी के बारे में ज्यादा चिंतित रहे होंगे तभी तो उन्हें संदेश अथवा फोन उठाने की फुर्सत ना मिली यह लिखे जाने तक अभी तक मुझे उनका कोई भी जवाब नहीं मिला है।

डॉक्टर की पर्ची पर घर पर ऑक्सीजन लगाने के लिए कहीं से खाली सिलेंडर भी जुटा लिया गया लेकिन फिर वही लालफीताशाही ईएसआई अस्पताल में उनको वापस लौटा दिया गया कि आपको सिलेंडर नहीं दिया जाएगा ।

तो क्या मरीज को  ब्लैक से सिलेंडर खरीदने के लिए यह कार्य प्रणाली मजबूर तो नहीं कर रही है इसमें भी कोई 7% का खेल है ।

मेडिकल कॉलेज के अधीक्षक डॉक्टर सी एस सुशील को भी मैंने संदेश भेजा एवं फोन पर संपर्क करने का प्रयास किया लेकिन शायद वह भी मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी के कदमों पर चल रहे प्रतीत हो रहे हैं।

जहां एक और हमारे ईमानदार स्वास्थ्य कर्मी डॉक्टर, नर्सिंग स्टाफ एवं सहायक कर्मचारी पूरी इमानदारी से अपने कर्तव्य का निर्वहन कर सैकड़ों लोगों को मौत के मुंह से वापस लाने का प्रयास कर रहे उनको दिल से सलाम करता हूं ऐसे लोगों की वजह से ही अभी भी मानवता में विश्वास बचा हुआ है।

वहीं दूसरी और संवेदनशील पदों पर बैठे संवेदनहीन लोग संवेदनहीनता का परिचय देते हैं तो उनको उठाकर फेंकने में भी देरी नहीं की जानी चाहिए ।

आज इस महामारी के समय में आपको और हमको सबको हाथ से हाथ मिला कर मुकाबला करना है आए और हम सब मिलकर इसका मुकाबला करें और ऐसे संवेदनहीन व्यक्तियों की पहचान भी करें । उनको आज नहीं तो कल ईश्वर न्याय अवश्य देगा यह निश्चित है ।

प्रदीप जैन
संपादक
देश की धरती पत्र समूह

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