सवाई माधोपुर (देश न्यूज)। समाजिक सेवा कार्यों से जुड़ी हुई अर्चना मीना का मानना है कि संपर्क की स्वतंत्रता पर लगाम लगाने के प्रयास में सरकार द्वारा संपर्क की अनिवार्यता को बाधित करना, कहीं ना कहीं निर्णय लेने की क्षमता पर प्रश्नचिन्ह लगाता है। वर्तमान परिस्थिति यां पहले से ही कोविड-19 के चलते समस्त कार्यों के लिए आवश्यक, संपर्क की चेन को छिन्न-भिन्न कर चुकी हैं। ऐसे में किसी भी प्रकार की चुनौती सामने आने पर सरकार द्वारा उससे निपटने के परम्परागत तरीकों या प्रशासनिक तौर पर लिये जाने वाले निर्णयों की प्रक्रिया व प्रमाणिकता पर पुनर्विचार करना चाहिए।
अर्चना मीना का कहना है कि यह वाकई दुर्भाग्यपूर्ण है कि किसी आंदोलन को फैलने से रोकने का पहला उपाय सरकार ने इंटरनेट सेवाओं को बंद करने का सोचा, जब कि यह आंदोलन हमेंशा पूर्व चेतावनी के साथ होता है, और यह पहली बार नहीं है कि प्रशासन एवम् सरकार के समक्ष यह चुनौती आयी हो। आज प्रत्येक विद्यार्थी डिजिटल माध्यमों से ऑनलाइन शिक्षा ग्रहण कर रहा है। क्या उनके लिए कोई वैकल्पिक व्यवस्था अनिवार्य नहीं थी ? प्रत्येक प्रतियोगी परीक्षा, उसका प्रवेश पत्र, आदि सभी के लिए इन्टरनेट सेवाऐं आवश्यक हैं। क्या युवाओं के भविष्य के लिए पूर्व में विचार कर कोई उपाय नहीं सोचना चाहिए था ? वृद्ध अवस्था में अपनों से दूर रह रहे माता-पिता व वरिष्ठ जन, जो कोविड़ के चलते अपने बच्चों के पास जाने व उनसे मिलने में असमर्थ हैं, उनकी मनोस्थिति पर पडऩे वाले प्रभाव से क्या हमारी सरकार की संवेदनशीलता अनभिज्ञ है ? और तो और हमारा स्वास्थ्य, जो आज हमारी पहली प्राथमिकता है, वह भी डॉक्टर्स के साथ हमारे ऑनलाइन परामर्श पर ही निर्भर है। ना सिर्फ कोविड-19, कैंसर और अन्य दुसाध्य बीमारियों से जूझते हमारे बच्चे, वृद्ध, विशेष योग्यजन और गर्भवती माताऐं भी अपने मेडिकल असिस्टेंट के लिए केवल और केवल इंटरनेट सेवाओं पर निर्भर हैं। ऐसे में कितना प्रमाणिक है इतने लंबे समय के लिए इंटरनेट सेवाओं को बंद करने का निर्णय लेना ?
हम सरकार चुनते हैं ताकि हमारे लिए वह सर्वश्रेष्ठ निर्णय ले सके। जो प्रासंगिक हो, संतुलित हो और जिनका परिणाम सकारात्मक आ सके। किंतु जब विपरीत परिस्थिति का हल निकालने से अधिक, उस परिस्थिति को दबा डालने पर ही सरकार का ध्यान केंद्रित हो तो फिर वह यह विचार करने में नाकाम रहती है कि निर्णय का सकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है या नकारात्मक।
विगत दिनों में गुर्जर आंदोलन के चलते संपूर्ण धरना संभावित क्षेत्रों में इंटरनेट सेवाऐं समाप्त कर दी गई, बिना यह विचार किए कि, पुलिस भर्ती परीक्षा, नीट के कॉलेज सलेक्शन आवेदन, छात्रवृत्ति के आवेदन पत्र आदि के साथ रोजमर्रा के ऑनलाइन एजुकेशन, ऑनलाइन कोचिंग क्लासेज, डिजिटल माध्यम से हो रहे रेलवे रिजर्वेशन, डिजिटल पेमेंट एवं बैंकिंग गतिविधियाँ, डिजिटल व्यापार, राशन सामग्री वितरण जैसी व्यवस्थाऐं कैसे चल पाएंगे।
लोंग डिस्टेंस लर्निंग में कक्षाऐं क्षेत्र विशेष के बच्चों के लिए नहीं रुकेगी, और अधिकांश संस्थाएं 24 घंटे के अंदर अपनी कक्षाओं का रिकॉर्ड भी नहीं रखती, तो बच्चों पर और उनके भविष्य पर कितना प्रभाव पड़ेगा ? क्या यह सरकार को निर्णय लेने से पहले पता नहीं था ? क्या व्यापक रूप से परिस्थितियों पर विचार विमर्श नहीं किया गया ? संभवत: किया भी गया हो तो जनमानस पर पडऩे वाले प्रभाव का प्रश्न शायद उनके लिए इतना बड़ा नहीं है।
क्या इन्टरनेट सेवाओं को अनिश्चत काल के लिए बन्द करना आम जन के मौलिक अधिकारों को हनन नहीं है ? सुप्रीम कोर्ट के अनुसार इंटरनेट का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 19 के तहत बोलने एवं अभिव्यक्ति की आजादी का हिस्सा है।
कभी-कभी विचार आता है कि हमारे यहाँ निर्णयों के पीछे मानवता की भावना का स्थान क्या है ? हमारे निर्णयों के हर एक पक्ष में हम मानव को सर्वोपरि नहीं रखते, इसका कारण संभवत: यह तो नहीं कि हम हर परिस्थिति को झेलने के आदी हो गए हैं। कोई आंदोलन है, तो हो जाएगा। कोई धरना है, तो होगा। कुछ दिनों में खत्म हो ही जाएगा। सब कुछ चलता है, होता रहेगा। ये जुमले आखिर कब तक ?
किस दिन हम स्वयं उस जागृति की ओर बढ़ेंगे जो अनुभूति करवाती है, कि हमें स्वयं ही आवाज उठानी है। हर बार, हर कार्य केवल इसी मानसिकता से नहीं देखा जाना चाहिए और ना ही देखना चाहिए, कि चलता है ! हमें कभी नहीं भूलना चाहिए कि सरकार हमारे कल्याण के लिए है, और सरकार एवं प्रशासन स्वयं के कार्य आसान बनाने के लिए हमारी मूलभूत आवश्यकताओं के साथ खिलवाड़ नहीं कर सकते।
उल्लेखनीय है कि अर्चना मीना जिले में लगातार कई वर्षों से सामाजिक सेवा कार्यों से जुड़ी हुई हैं। इन्होने पूरे कोरोना काल के दौरान जागरूकता के साथ साथ गरीब, पीडि़त आमजन की सेवाओं हेतु उल्लेखनीय कार्य किये हैं।

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