सरकारी नौकरियों में रिटायरमेंट आयु की अवधि कम की जाए


विपक्ष खासकर, कांग्रेस जो मुद्दे प्रमुख रूप से उठाते रहे हैं, जिनमें पहला है गिरती अर्थव्यवस्था और दूसरा है बेरोजगारी का। यह दोनों ही मुद्दे गेम चेंजर बन सकते हैं। इधर सरकारें रोजगार के मुद्दे को आंकड़ेबाजी तथा झांसेबाजी में ही उलझाए रखना चाहती है। यह दोनों मामले सरकारों की प्राथमिकताओं में होते हुए भी वास्तविकता के धरातल पर इनका प्रभावी क्रियान्वयन नहीं दिखाई पड़ता। पढ़े-लिखे नौजवानों में इससे निराशा और मायूसी छाई हुई है।किसी युवा की बेरोजगारी उसका अकेले का ही मामला नहीं होता, उसके पूरे परिवार के भविष्य से जुड़ा मामला होता है। रोजगार और नौकरियों के नाम पर छल की राजनीति आखिर कब तक चलेगी?

देश की श्रम शक्ति, ऊर्जा और दिमाग का ह्रास हो रहा है। बेरोजगारी भी एक तरह से युवाओं का दमन और उन पर अत्याचार करने जैसा ही है। ऐसा भी नहीं है कि रोजगार के साधनों की कमी है या कि सरकारी नौकरियां ही नहीं है। आज सरकारी दफ्तरों में ही अधिकांश पद खाली पड़े हुए हैं। जिससे राजकाज भी प्रभावित हो रहा है। सरकार ने युवाओं के शोषण का तरीका संविदा कर्मी बनाकर निकाला हुआ है, कोई कहता है यह आरक्षण तोड़ का फार्मूला है। रिटायरमेंट की आयु में भी वृद्धि कर दी गई है। इतना ही नहीं घिसेपिटे और शारीरिक रूप से थक चुके या भ्रष्टाचार और निकम्मेपन की प्रतिमूर्ति बने लोगों को भी संविदा श्रेणी में नौकरी पर बनाए रखा जाता है। जिससे नवाचार के नए विचार रखने वाले काबिल नौजवान नौकरी के लिए तरसते ही रह जाते हैं। सरकारों ने हर निर्णय को वोट बैंक से जोड़ दिया है।

जो इसका विरोध करते हैं वह भी सत्ता में आने पर वैसा ही आचरण करते हैं। राजस्थान में लगभग प्रत्येक महकमे में हजारों नौकरियां निकाली गई। किंतु ज्यादातर कोर्ट कचहरी में अटका दी गई है। नौकरी के लिए पात्रता परीक्षा ले ली गई तो उनके परिणाम नहीं निकाले, तो कहीं घोषित रिक्तयां ही निरस्त कर दी गई। प्रस्तावित भर्तियों के जो आंकड़े आए हैं वह आम जनता से खुली धोखाधड़ी करने जैसे हैं। जिससे युवाओं के सपने टूट रहे हैं और वह आक्रोश से तमतमा रहे हैं तथा बेरोजगारी की पीड़ा से छटपटा रहे हैं। वर्ष 2019 के बजट में मुख्यमंत्री जी ने 75 हजार भर्तियों का ऐलान किया था। आज तक तो यह कोरी घोषणा ही है।

काबिले गौर बात यह है कि तमाम विभागों की भर्तियां रुकी हुई। कहीं कोर्ट में, तो कहीं सरकार के स्तर पर। किंतु आर ए एस की परीक्षा और भर्ती कभी नहीं रुकी, न ही कभी अटकी ही है।कहते हैं कि इनमें ज्यादातर अभ्यार्थी हाई लेवल तबके के या नौकरशाहों से जुड़े होते हैं। तात्पर्य यह कि सरकार की इच्छाशक्ति पर है कि भर्तियां करें या अगले चुनाव तक इसके लालच को बनाए रखें ।

देश की तरुणाई के प्रति ऐसा नजरिया अक्षम्य है। सरकारी नौकरियों में रिटायरमेंट की आयु 55 वर्ष हुआ करती थी जो 65 से 70 वर्ष तक की जा चुकी है। जबकि बेरोजगारी का समुद्र उफान पर है। तो ऐसे में * सरकारी नौकरियों में रिटायरमेंट की आयु सीमा का पुन:निर्धारण करने पर विचार करना सामयिक होगा। रिटायरमेंट की आयु कम से कम 5 से 10 वर्ष घटाकर देश में करोड़ों युवाओं को नौकरी के अवसर दिए जा सकते हैं। *

गयाप्रसाद बंसल

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