जयपुर, 19 अगस्त (हि. स.)। प्रदेशभर में भाद्रपद शुक्ल पक्ष चतुर्थी शनिवार को गणेश चतुर्थी का पर्व परंपरागत रूप से मनेगा। प्रदेशभर के बड़े गणेश मंदिरों में गणेशोत्सव की शुरुआत हो चुकी है, लेकिन इस साल इसकी शुरुआत कोरोना के कारण फीकी है। कोरोना महामारी के संक्रमण की वजह से बड़े मंदिर सरकार की गाइडलाइन के अनुरुप बंद है। जबकि, बड़े धार्मिक समारोह के आयोजन पर भी प्रतिबंध है। ऐसे में हर साल धूमधाम से मनाए जाने वाले गणेश चतुर्थी पर्व पर इस साल रौनक दिखाई नहीं देगी। कोरोना के कारण पहली बार भक्त न तो कार्यक्रमों में हिस्सा ले पाएंगे और न ही गजानन के दर्शन कर सकेंगे। हालांकि, कई मंदिरों के प्रबंधन ने भक्तों के लिए दर्शन, झांकी, आरती और अन्य कार्यक्रम ऑनलाइन दिखाने की व्यवस्था की है, लेकिन श्रद्धा और आस्था के आगे यह प्रयास नाकाफी है। राजधानी जयपुर के मोतीडूंगरी गणेश मंदिर में महंत कैलाश शर्मा के सान्निध्य में बुधवार को मोदक की झांकी सजाई गई। झांकी में 251 किलो के 2 मोदक, 51 किलो के दो मोदक और 21 किलो के 101 मोदक और 1.25 किलो के मोदक भगवान के समक्ष अर्पित किए। इस दौरान भगवान गणेश को विशेष पोशाक के साथ माणक व पन्ना लगा सोने का मुकुट धारण करवा कर चांदी के सिंहासन पर विराजित किया गया। शाम को गजानन महाराज का मनोहरी शृंगार कर फूल बंगले में विराजमान करवाया गया। प्रथम पूज्य का शुक्रवार को सिंजारा महोत्सव भी बिना भक्तों की मौजूदगी में ही मनेगा। ब्रह्मपुरी स्थित नहर के गणेश मंदिर में महंत पंडित जय शर्मा के सान्निध्य में तीन दिवसीय कार्यक्रम की शुरुआत शुक्रवार से होगी। बुधवार को लंबोदर को नवीन चौला धारण करवाया गया। शुक्रवार को सिंजारा महोत्सव मनेगा। शनिवार सुबह सात बजे से गणेश चतुर्थी के कार्यक्रमों की शुरुआत होगी। भगवान को साफा व खास राजशाही पोशाक धारण करवाई जाएगी। इसके बाद मोदकों का भोग लगेगा। चांदपोल परकोटा गणेश मंदिर में चार दिवसीय महोत्सव की शुरुआत बुधवार सवेरे पंचामृत अभिषेक से हुई। गजानन को नवीन पोशाक धारण करवा कर फूल बंगले में विराजित किया गया। उन्हें शुक्रवार को सिंजारा महोत्सव के तहत मेहंदी अर्पण की जाएगी एवं मोदक का भोग लगाया जाएगा। शनिवार को सोने के वर्क का चोला चढ़ाकर नवीन पोशाक धारण करा छप्पन भोग की झांकी व फूल बंगला झांकी सजाई जाएगी। सूरजपोल बाजार स्थित श्वेत सिद्धि विनायक मंदिर में अलसुबह गजानन का दुग्धाभिषेक कर हरि दुर्वा के अंकुरों से पूजा की गई। इसके अलावा अन्य मंदिरों में भी गणेश उत्सव की शुरुआत हुई।

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